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श्रीमद्भागवत महापुराण से जुड़े इस रहस्य को नही जानते होंगे, जानिये इस लेख में

भागवत महापुराण, सभी पुराणों में सर्वश्रेष्ठ हैं। वैसे तो सभी वेदों-पुराणों में उच्चतम बातें बताई गई हैं। हालांकि फिर भी भागवत को मोक्ष का द्वार माना जाता हैं, जिसके श्रवण मात्र से जीवन के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं भागवत महापुराण से जुड़ी कुछ बातें। आज के समय में श्रीमद्भागवत पुराण का महत्व किसी से छुपी हुई नही हैं। आज लोग बड़े-बड़े संतों के मुख से भागवत की कथा सुनते हैं मगर यह जानना भी आवश्यक होता हैं की आखिर भागवत की कथा सबसे पहले किसने सुनी थी ?

राजा परीक्षित और ऋषि शमीक

एक दिन की बात है एक आश्रम में शमीक नामक एक ऋषि समाधि में अकेले बैठे हुए थे, उस आश्रम में शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी और अन्य ऋषि कुमार भी रहते थे। जिस वक्त शमीक ऋषि समाधि में बैठे हुए थे उस वक्त वहां कोई और मौजूद नही था।  तभी अचानक वहां प्यास से व्याकुल राजा परीक्षित पहुंचे। वो प्यास से बहुत व्याकुल थे और आश्रम में पानी खोजने लगे। जब उन्हें कहीं से पानी नहीं मिला तो उन्होंने समाधि में बैठे शमीक ऋषि को प्रणाम कर विनम्रता से कहा- मुझे प्यास लगी है, कृपा मुझे पानी दीजिए। राजा के दो-तीन बार कहने पर भी ऋषि ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया, उन्हें बहुत बुरा लगा और तो और उन्हें लगा कि ऋषि ध्यान का ढोंग कर रहे हैं। क्रोध में आकर राजा परीक्षित ने एक मरा सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और वहां से चले गए परंतु उन्हें आश्रम से जाते हुए एक ऋषि कुमार ने देख लिया और जाकर श्रृंगी को इसके बारे में खबर दी।

ऋषि श्रृंगी का राजा परीक्षित को श्राप

सभी राजा के स्वागत के लिए आश्रम पहुंचे। परंतु जब तक सब पहुंचे राजा वहां से जा चुके थे और ध्यान में बैठे शमीक ऋषि के गले में मरा सांप पड़ा था। ये देखकर ऋषि श्रृंगी को बहुत क्रोध आया और उन्होंने हाथ में पानी लेकर परीक्षित को शाप दे दिया कि मेरे पिता का अपमान करने वाले राजा परीक्षित की मृत्यु आज से सातवें दिन नागराज तक्षक के काटने से होगी। इसके बाद ऋषिकुमारों ने ऋषि शमीक के गले से सांप निकाला जिस बीच शमीक की समाधि टूट गई। शमीक ऋषि ने पूछा, क्या बात है? तब श्रृंगी ने सारी बात बताई। शमीक बोले, बेटा, राजा परीक्षित के साधारण अपराध के लिए तुमने जो सर्पदंश से मृत्यु का भयंकर शाप दिया है, यह बहुत बुरा है। हमें यह शोभा नहीं देता। इसका मतलब ये है कि अभी तुझे ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। अब तू भगवान की शरण में जा और अपने अपराध की क्षमा मांग।

राजा परीक्षित का पश्चाताप

राजा परीक्षित को राजभवन पहुंचते-पहुंचते अपनी गलती का अहसास हो चुका था। थोड़ी देर बाद शमीक ऋषि का एक शिष्य राजा परीक्षित के पास पहुंचा और उसने कहा, राजन, ब्रह्मसमाधि में लीन शमीक ऋषि की ओर से आपका उचित सत्कार नहीं हो पाया, जिसका उन्हें बहुत दुख है। किंतु, आपने बिना सोचे-समझे जो मरे सांप को उनके गले में डाल दिया। इस कारण उनके पुत्र श्रृंगी ने आपको आज से सातवें दिन सांप काटने से मृत्यु का शाप दे दिया है जो असत्य नहीं होगा। इसलिए आप मेरी बात मानें तो सात दिन तक अपना पूरा समय ईश्वर-चिंतन में लगा दें ताकि आपको मोक्ष मिल सके। ये सुनकर राजा को संतोष हुआ कि मेरे द्वारा हुए अपराध के लिए मुझे उचित दंड मिलेगा। इसके बाद राजा परीक्षित व्यासपुत्र शुकदेव मुनि के पास पहुंचे और उन्हें भागवत कथा सुनाने के लिए कहा। शुकदेवजी ने परीक्षित को सात दिन भागवत-कथा सुनाई। ऐसा माना जाता है कि तभी से भागवत सप्ताह सुनने की परंपरा प्रारंभ हुई थी।

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