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इस हीरोइन को देखकर, अपने डायलॉग भूल जाते थे राजकुमार

बात 60 के दशक के अंतिम सालों की है। तब मीना कुमारी बॉलीवुड यानी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की टॉप की एक्ट्रेस हुआ करती थी। तभी कोई बीस साल के एक लड़के ने मीना कुमारी को डायरेक्ट करने के लिए अप्रोच किया। उस लड़के का नाम था सावन कुमार टाक। इस डायरेक्टर ने इससे पहले ‘नौनिहाल’ नाम की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई थी, जिसके गीत कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे। इस फिल्म में भारत के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की आंतिम यात्रा दिखाई गई थी।

अब हुआ यह कि सावन, मीना कुमारी को लेकर फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन हिम्मत नहीं हो पा रही थी। एक दिन हिम्मत करके उन्होंने मीना कुमारी के घर फोन लगा दिया। फोन रिसीव किया मीना की बहन खुर्शीद ने। उस वक़्त खुर्शीद ही मीना कुमारी के काम को देखा करती थीं।ख़ैर, सावन कुमार टाक ने अपने बारे में सारी जानकारी दी और अपनी फिल्म के बारे में भी बताया। खुर्शीद ने सावन से कहा कि आप मीना आपा को आकर अपनी कहानी सुना दीजिए। तुरंत मुलाक़ात का वक़्त भी मुकर्रर कर लिया गया।

अब मुलाक़ात वाले दिन जब मीना कुमारी ने इतनी कम उम्र के डायरेक्टर को देखा, तो वो घबरा गईं। फिर भी उन्होंने सावन की बात को इत्मीनान से सुना। सावन की कहानी को लेकर मीना सकारात्मक थीं। एक दिन मीना के यहां से सावन को फोन गया कि फिल्म कब शुरू करना चाहते हैं, मीना कुमारी इस फिल्म में काम करने को तैयार हैं।

फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई और तकरीबन छह महीने की शूटिंग के बाद एक दिन सावन ने मीना कुमारी को फिल्म के कुछ हिस्से दिखाए। वो देखकर मीना काफी खुश हो गई, लेकिन तभी मीना की तबियत अचानक ख़राब हो गई। सावन के काम से मीना काफी प्रभावित हुई और अब सावन का मीना के घर बेरोक-टोक आना भी शुरू हो चुका था। बीमार मीना को देखने सावन रोज यानी 60 के दशक में तीन सौ रुपए के फूल लेकर जाया करते थे।

सावन, मीना कुमारी से बैठ कर घंटों बात किया करते थे। यहां तक कि जब मीना खून की उल्टी करती थी, तो सावन खुद फर्श साफ किया करते थे। इसी दौरान एक दिन मीना ने कहा, ‘सावन, तुम जितनी मेरी सेवा करते हो, उतनी तो किसी अपने ने भी नहीं की होगी’। मीना ने आगे कहा कि सावन यूं मेरे घर आकर तुम अपना समय मत बर्बाद किया करो। अपनी फिल्म पर ध्यान दो और उसे पूरी करो।

सावन ने कहा कि मीना जी मेरी फिल्म नहीं बनेंगी, क्योंकि फाइनेंस जितना भी था, सब ख़त्म हो गया है। सावन की बात सुन मीना चुपचाप देखती रहीं। कुछ देर बात मीना ने सावन से कहा कि देखो परेशान न हो। कुछ न कुछ इंतज़ाम हो जाएगा। एक इंटरव्यू के दौरान इस क़िस्से को सच बताते हुए ख़ुद सावन कुमार ने कहा कि मीना कुमारी ने कुछ दिनों बाद मुझे डेढ़ लाख रुपए दिए। रुपए देते समय उन्होंने यह भी कहा कि इसे दान मत समझना। जब तुम्हारे पास पैसे आए, तो इन्हें लौटा देना। अब फिल्म को जल्दी से जल्दी पूरी करो। कहीं ऐसा न हो कि इस फिल्म को देखने से पहले ही मैं चली जाऊं।

इस वाकये के कुछ दिन बाद पता चला कि मीना कुमारी ने अपना बांद्रा वाला फ्लैट मुमताज़ को बेच कर डेढ़ लाख रुपए सावन कुमार को दिए थे, ताकि वो फिल्म पूरी कर सकें। सावन कुमार, मीना कुमारी के इस अहसान को कभी नहीं भूलें, तभी तो जब मीना कुमारी अस्पताल में थीं और उनके पास अपने इलाज़ तक के पैसे ख़त्म हो गए थे, तब सावन कुमार ने अपनी महंगी गाड़ी बेचकर अस्पताल के पंद्रह हज़ार का बिल चुकाया था।

ख़ैर, जिस फिल्म की बात की जा रही है, वो फिल्म साल 1972 में आई ‘गोमती के किनारे’ है। यह मीना कुमारी की आखिरी रिलीज़ फिल्म थी। हालांकि, यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ ख़ास कमाल तो नहीं कर पाई। फिर भी सावन कुमार के करियर की गाड़ी को एक स्टार्ट तो मिल ही गया।

वे जिंदा होती तो 85 साल की होती । उन्हें हिंदी सिनेमा की ‘फीमेल गुरु दत्त’ के साथ ट्रेजेडी क्वीन के नाम से भी पहचाना जाता है। मीना कुमारी की फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी इमेज थी कि एक्टर राजकुमार उन्हें देखकर अपने डायलॉग भूल जाते थे। मधुबाला उनकी जबरदस्त फैन थी। अमिताभ बच्चन मानते हैं कि जिस अंदाज में मीना कुमारी पर्दे पर डायलॉग बोलती थी , उस अंदाज में दूसरा कोई नहीं बोल सकता ।

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